खोखली गुटबाजी और ‘शील्ड’ की राजनीति में उलझा भारतीय पत्रकार संघ: धरातल पर तड़पते सवाल, बस भीड़ बनकर रह गए पत्रकार
नई दिल्ली :लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकारिता जगत से आज एक ऐसी कड़वी सच्चाई सामने आ रही है, जिसने समूचे पत्रकार संघों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। देश के पत्रकारों के हक और हितों की रक्षा का दम भरने वाला भारतीय पत्रकार संघ आज खुद आंतरिक कलह, दो फाड़ और गुटबाजी का शिकार हो चुका है। जमीनी हकीकत यह है कि यह संगठन अब पत्रकारों की बुनियादी समस्याओं को सुलझाने के बजाय केवल आपसी वर्चस्व की लड़ाई, चमचमाती ‘शील्ड’ बांटने और शक्ति प्रदर्शन के लिए ‘भीड़’ जुटाने का जरिया बनकर रह गया है।
दिखावे का बाजार: ‘शील्ड’ और सम्मान की राजनीति
संगठन के भीतर से ही उठ रही आवाजें बताती हैं कि अब इन गुटों का मुख्य उद्देश्य केवल साल में कुछ बड़े ‘इवेंट’ आयोजित करना, मंच पर नेताओं या रसूखदारों को बुलाना और थोक के भाव में ‘शील्ड’ या प्रशस्ति पत्र बांटना रह गया है। सोशल मीडिया पर वाहवाही लूटने और अपनी डफली-अपना राग अलापने की इस होड़ में उन पत्रकारों को पूरी तरह भुला दिया गया है, जो रोज धरातल पर जान जोखिम में डालकर खबरें लाते हैं।
असली पत्रकार हाशिये पर, संगठन में सिर्फ ‘भीड़’ का बोलबाला
सबसे बड़ा और चिंताजनक आरोप यह लग रहा है कि इन गुटों को अब पत्रकारिता के हितों से कोई सरोकार नहीं है। सदस्यता बढ़ाने और अपनी ताकत का झूठा प्रदर्शन करने के लिए संगठन में ऐसे लोगों की फौज खड़ी कर दी गई है, जिनका सक्रिय पत्रकारिता से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। इसके चलते सच्चे, ईमानदार और जरूरतमंद पत्रकार खुद को इस भीड़ में पूरी तरह उपेक्षित और अकेला महसूस कर रहे हैं। संगठन अब पत्रकारों का मंच कम और गैर-पत्रकारों की ‘भीड़’ का हिस्सा ज्यादा नजर आने लगा है।
फाइलों में दबे असली मुद्दे: कब मिलेगी सुरक्षा और न्याय?
आज देश भर में पत्रकारों के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है। चाहे वह पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने की मांग हो, डिजिटल और ग्रामीण पत्रकारों को उचित मानदेय व मान्यता दिलाना हो, या फिर कवरेज के दौरान पत्रकारों पर होने वाले जानलेवा हमलों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ना हो—इन तमाम बुनियादी और गंभीर मुद्दों पर दोनों ही गुट पूरी तरह मौन साधे हुए हैं।
एक बड़ा यक्ष प्रश्न
इस पूरी स्थिति ने देश के सजग पत्रकारों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या ये संगठन वाकई उनके अधिकारों के रक्षक हैं या फिर कुछ लोगों की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की ढाल? अगर समय रहते इन तथाकथित संघों ने अपनी गुटबाजी छोड़कर पत्रकारों के वास्तविक हितों के लिए जमीन पर काम करना शुरू नहीं किया, तो वह दिन दूर नहीं जब पत्रकार इन खोखली संस्थाओं का पूरी तरह से बहिष्कार कर देंगे।



